फूलों की खेती

वेदारण्यम में महिला नमक कामगारों के लिए आय का अतिरिक्त स्रोत

Floriculture
Floriculture

पृष्ठभूमि

वेदारण्यम भारत का एक प्रमुख नमक उत्पादक क्षेत्र है। नमक क्षेत्र के आस पास के गांवों में परिवार मुख्य रूप से नमक कामगार के रूप में कार्य करते हैं और इसके बाद फिशिंग और कृषि कार्य करते हैं। इन गांवों की अधिकांश महिलाएं नमक के खेतों में मजदूर के रूप मे कार्य करके अपनी आजीविका चलाती हैं। नमक के कम उत्पादन वाले समय के दौरान (अक्तूबर से जनवरी-उत्तरपूर्वी मानसून सीजन) नमक कामगार आमतौर पर अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने संबंधित नमक खेत के मालिक या साहूकार से धन अग्रिम लेते हैं। तथापि, अधिकांश महिला प्रमुख वाले परिवार को नमक खेत के मालिक द्वारा अग्रिम देने से मना कर दिया जाता है और वे अनिवार्य रूप से अधिक ब्याज दर पर साहूकार से धन उधार लेते हैं। इस परिदृश्य में आईसीजेडएम परियोजना की सहायता से आदिवासी कालोनी, कोविलन कोलाई और पूवंथोपू गांव की गरीब महिला नमक कामगारों ने नमक के कम उत्पादन वाले मौसम के दौरान अपना खर्चा पूरा करने के लिए आय सृजन कार्यकलाप के वैकल्पिक स्रोत के रूप में फूलों की खेती को अपनाया है।

प्रक्रिया

ग्राम विकास परिषद के सदस्यों के साथ लगातार बैठकें करके तथा महिला नमक कामगारों के साथ केंद्रित चर्चा ने आर्थिक उद्यम के रूप में फूलों की खेती शुरू करने के लिए रास्ता तैयार किया। इन बैठकों और चर्चाओं ने उन महिलाओं की पहचान करने में भी सहायता की जो वास्तव में फूलों की खेती करना चाहती थीं। महिला मुखिया वाले परिवारों और गरीब आर्थिक पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को वरीयता दी गई। नमक की खेती मे कार्य करने के माध्यम से या अन्य आर्थिक कार्यकलाप के माध्यम से धनार्जन में अक्षम महिलाओं को भी शामिल किया गया। फूलों की खेती से संबधित कार्यकलाप करने के लिए संबंधित गांव की ग्राम विकास परिषद ने आदिवासी कालोनी की 23, कोविलान कोलाई गांव की 21 तथा पूवोंथोपू गांव की 30 महिलाओं का चयन किया।महिलाओं को अलग अलग कार्यालय पदाधिकारियों और रिकार्ड के साथ ‘फूल उगाने वाले समूह’ में बांटा गया। कार्यालय पदाधिकारियों में अध्यक्ष, सचिव और खजांची शामिल है जो अनिवार्य रूप से समूह के कार्यकलापों का प्रबंध करने, फूलों का विपणन करने, बैंक में धनराशि को जमा करने और मासिक आधार पर महलाओं को आय का वितरण करने का कार्य करते हैं। फूल उगाने वाले समूह ने आदिवासी कालोनी में 1.3 एकड़ भूमि , कोविलन कोलाई में 2 एकड़ भूमितथा पूवंथोप्पू में 3 एकड़ जमीन लंबी अवधि के पट्टे पर ली है।

फूल की खेती के लिए फूलों की प्रजातियों का चयन

फूल की खेती करने के लिए पट्टे पर ली गई जमीन की मिट्टी और पानी की जांच करने पर यह पता चला कि इलाका लवणीय है और सिंचाई के लिए पानी की भी किल्लत है। पुष्पविज्ञानियो से परामर्श करके सूखा और लवण प्रतिरोधी नीरियम और जेस्मीन को खेती के लिए चुना गया। इसके अलावा, इन फूलों को सांयकाल में कलियों के रूप में तोड़ कर प्रोसेसिंग के उपरांत बाजार में भेजा जा सकता है। नीरीयम पूरे वर्ष के दौरान फूल देता है जबकि जेस्मीन का अधिकतम उत्पादन गर्मी के दौरान होता है।

क्षमतावर्धन

महिला समूहों के लिए डिंडुगल और रामेश्वरम के लिए अनुभव दौरों का आयोजन किया गया क्योंकि वहां अनेक परिवार जैस्मीन की खेती में लगे हुए हैं। इन दौरों से फूल की फसल की खेती करने के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ और इससे महिलाएं को फूलों की खेती करने के लिए प्रेरणा भी मिली। प्रारंभ में महिलाओं के पास कृषि और फूलों की खेती का बहुत कम ज्ञान/कोई ज्ञान नही था। इन फूलों की खेती करने वाले किसानों से बात करके और खेतों का दौरा करके न केवल महिलाओं में विश्वास पैदा हुआ अपितु इससे उनको खेती करने के लिए प्रोत्साहन मिला। डिंडुगल के अनुभवी किसानों ने प्रारंभ में महिला नमक कामगारों के खेतों का नियमित दौरा किया और खेती करने तथा पैदावार के तौर-तरीकों के बारे में उनको निर्देशित व प्रशिक्षित किया। जब पैदावार के बारे में कम ज्ञान के कारण शुरूआती दिनों में फूलों की बर्बादी हुई तो डिंडुगल के किसानों ने पैदावार के सही तरीके के बारे में बताया और इसके बाद फसल की बर्बादी में महत्वपूर्ण कमी आई।

भूमि की तैयारी और पौधरोपण

भूमि की तैयारी मशीनो और फूलों की खेती में शामिल सदस्यों के श्रम से की गई। भूमि को तैयार करने, बाड़ लगाने, मेड़बंदी करने, पौधे लगाने और अन्य इनपुट की लागत का वहन परियोजना द्वारा किया गया जबकि खेती में भाग लेने वाली महिलाओं ने श्रम लागत का वहन किया। पानी का नुकसान कम करने तथा नमी को बनाए रखने तथा सूर्य के प्रकाश से जड़ो को बचाने के लिए भी नारियल की जटा तथा मज्जा का उपयोग किया गया। फूल उगाने वाले समूह ने डिंडुगल के निकट कोदई रोड से नीरीयम के तने की कटिंग और रामेश्वरम के किसानों से जैस्मीन के पौधे का प्रापण किया। तैयार भूमि को 12 फीट की दूरी देकर पंक्तियों में बांट दिया गया। आधी भूमि पर नीरीयम तथा आधी पर जैस्मीन के पौधे रोपे गए। आरंभिक अवधि में दो पंक्तियों के बीच उपलब्ध जगह में बैंगन, ग्वारफली और भिंडी की सब्जियां उगाई गईं। तथापि, अब यह बंद कर दिया गया है क्योंकि पौधे बड़े हो गए और इन्होनेंफूल देना शुरू कर दिया है। आदिवासी कालोनी और कोविलनकोलाई में सिंचाई की सुविधा बिजली के मोटर से देना शुरू किया गया है। महिला समूह पौधों में पानी देने की व्यवस्था करती हैं। महिला और उनके परिवार के सदस्य अपने अपने पौधरोपण के क्षेत्र में निराई-गुड़ाई करके, फसल को पानी देकर, उर्वरक डाल कर और अन्य फसल प्रबंधन तरीकों का उपयोग करके प्रबंध करते हैं।

पुष्प का उत्पादन और विपणन

केविलन कोलाई में फूल की उपज मई 2014 में तथा आदिवासी कालोनी में जून 2014 में प्राप्त होना शुरू हो गई थी। नीरीयम के फूलों की उपज पूरे वर्ष के दौरान दैनिक आधार पर प्राप्त होती है। आरंभ में फूलों को स्थानीय खुदरा व्यापारियों को बेचा गया और अब यह फूलों के थोक व्यापारी को बेचे जाते हैं क्योंकि आपूर्ति अधिक होती है।

लागत लाभ मूल्यांकन

नीरीयम और जैस्मीन फूलों की खेती की लागत और लाभ की गणना ए1 मेथड का उपयोग करके की गई (अर्थात सभी चुकाई गई लागत सहित)।आदिवासी कालोनी और कोविलन कोलाई में नीरीयम और जैस्मीन से अर्जित आय काफी प्रभावी थी जो 2014-15 के लिए प्रतिवर्ष प्रति एकड़ क्रमश: 1,26,048 रूपए तथा 1,02,231 रूपए थी। लाभ-अलाभ विश्लेषण से यह संकेत मिलता है कि आदिवासी कालोनी और कोविलनकोलाई ने क्रमश: 1.5 वर्ष और 2 वर्षों में अपने लाभ-अलाभ बिंदु (बीईपी अर्थात (राजस्व-विचलन लागत/लाभ) प्राप्त कर लिया है। यह विश्लेषण स्पष्ट संकेत देता है कि यह प्रयास एक सफल प्रयास था और इसका अनुकरण किए जाने की व्यापक संभावना है।