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जियो टेक्स्टाइल ट्यूब तटबंध के संस्थापन के माध्यम से तटीय अपरदन नियंत्रण

Coastal Erosion Control
Coastal Erosion Control

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘ओडिशा में तटरेखा परिवर्तन’विषय पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि ओडिशा में मोटे तौर पर तटरेखा में 46.8 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और 14.4 प्रतिशत तटरेखा स्थिर है तथा 2.00 प्रतिशत तटरेखा कृत्रिम है। अपरदन (अधिक, मध्यम और कम) तटरेखा के 36.8 प्रतिशत भाग में हो रहा है, केवल 8.2 प्रतिशत भाग में अधिक अपरदन होता है। इस अपरदन का प्रमुख कारण राज्य के तटवर्ती जिलों में नियमित रूप से तुफान और बाढ़ की आवृति है।

धमारा-पारादीप विस्तार के साथ केंद्रपाडा जिले का पेंथा (200–32’ -5”N) 860– 5”E) एक कृषि गांव है। यह क्षेत्र विभिन्न नदियों यथा ब्राह्मणी, बैतरणी, चिंचीरी, पाठशाला, मैपुरा, खरासरोता, वरूणेई और धमारा से जुड़ा हुआ है। इसकी सामान्य भौगोलिक स्थिति अनियमित है और यह अनेक अपवाहिकाओं, नदियों, तालाबों, झीलों, दलदले स्थानों, खाड़ियों और लगूनों से भरा हुआ है। यह तट आलिव राइडली कछुओं द्वारा इधर-उधर निर्मित घोसलों के लिए जाना जाता है। यह समुद्र तट एक मिट्टी के तटबंध द्वारा विभाजित है जिसकी ऊंचाई लगभग 3 मीटर तथा लंबाई 1.5 किमी. है। इसमें से लगभग 400 मीटर लंबा क्षेत्र समुद्री जल से भर जाने के लिए अधिक संवेदनशील है और इसके कारण इस तट पर अपरदन की संभावना अधिक होती है। पेंथा गांव से सटा हुआ तटवर्ती क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों से लगातार अपरदन का शिकार होता रहा है। इस स्थान से लगे समुद्री किनारे पर पूरे वर्ष भर तेज लहरें टक्कर मारती रहती हैं। समुद्री सतह का ढाल तीब्र है। पेंथा की तटीय किनारा गांव की ओर शिफ्ट हो रहा है।

  • 1960 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 4000 मीटर दूर थी।
  • 2001 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 500 मीटर दूर थी।
  • 2005 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 200 मीटर दूर थी।
  • 2006 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 50 मीटर दूर थी।
  • 2008 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 20 मीटर दूर थी।
  • 2009 में तटरेखा मौजूदा पुराने तटबंध से 5 मीटर दूर थी।
  • 2009-10 में जर्जर हो चुके तटबंध को पुराने तटबंध के पिछले हिस्से से 60 मीटर दूर निर्मित किया गया।
  • समुद्री लहरों ने पुराने मौजूदा तटबंध को 2009-10 के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया था और 2011 में लकड़ी के स्टंप की पाइलिंग और रेजिन पीवीसी सैंडबैग डंपिंग का उपयोग करके सुरक्षा के पारंपरिक तरीके का प्रयोग किया गया।
  • 2011-12 में तटरेखा पुराने तटबंध को पार करके 400 मीटर आगे तक चली आई और 350 मीटर तटबंध को बहा दिया।

असुरक्षित अपरदन से पैंथा गांव को सुरक्षित करने के लिए एकीकृत तटीय अंचल प्रबंधन – राज्य परियोजना प्रबंधन यूनिट और जल संसाधन मंत्रालय, ओडिशा सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से साफ्ट इंजिनियरिंग का नवीनतम तरीका जिसमें जियो टेक्स्टाइल तटबंध की व्यवस्था करना शामिल है, अपनाया गया है। यह ओडिशा राज्य में एक प्रायोगिक परियोजना है जिसमें मौजूदा राजनगर-गोपालपुर लवणीय तटबंध की दीर्घावधिक सुरक्षा के लिए इस तटबंध पर खतरा उत्पन्न करने वाली लहरों को रोकने के लिए एक संरचनात्मक प्रणाली विकसित की जाएगी। इस प्रायोगिक परियोजना की सफलता समुद्र तट के अन्य असुरक्षित क्षेत्रों में समान मामलों के एक मॉडल के रूप में मानी जाएगी जो तटीय अपरदन को रोकने और भूमि, संपदा और जीवन को सुरक्षित करनेके लिए एक लंबा रास्ता तय करेगी। इसके अलावा, यह प्राकृतिक आपदाओं के समय तटों की रक्षा करेगी।

संस्थापन अवधि के दौरान किए गए विभिन्न कार्यकलाप और संघटक नीचे दिए गए हैं:

  • जियो टेक्स्टाइल ट्यूब तटबंध के संस्थापन के लिए स्थल का सर्वेक्षण करने, डिजाइन तैयार करने और तकनीकी दिशानिर्देश प्रदान करने के साथ साथ कार्य के गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी के लिए परियोजना परामर्शदाता के रूप में आईआईटी, मद्रास के सामुद्रिक इंजीनियरिंग विभाग की सेवाएं शुरू की गई हैं। परामर्शदाता ने स्थल का चयन किया और फील्ड जांच और मॉडलिंग अध्ययन के माध्यम से डिजाइन तैयार की है।
  • जियो ट्यूब तटबंध के निर्माण का कार्य मैसर्स गरवारे वाल रोप्स प्राइवेट लिमिटेड, पुणे को सौंपा गया है।
  • तटरेखा के 505 मीटर लंबे क्षेत्र को मौजूदा मिट्टी के तटबंध के साथ एकीकृत करके जियो ट्यूब से सुरक्षित किया गया है। इस तटबंध में रेत के गारे से भरी 235 जियो ट्यूब संस्थापित की गई है जिसे ग्रेनाइट गैबियन की रक्षात्मक परत से कवर किया गया है।

हस्तक्षेप के लाभ/प्रभाव

  • जियो ट्यूब के सामने रेत जमाव देखा गया।
  • स्थल पर पर्यटकों के दौरों की संख्या में वृद्धि हुई।
  • पेंथा के तटवर्ती गांवों को सुरक्षित कर लिया गया और साइक्लोन के कारण अब ये तटवर्ती बाढ़ से कम असुरक्षित हैं।
  • पेंथा और अन्य समीपवर्ती गांवों का जीवन और संपत्ति का समुद्री ज्वार और लहरों से बचाव हुआ है।
  • स्थानीय समुदायों की कृषि योग्य भूमि का लवणीय जल से बचाव हुआ है जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है।
  • स्थानीय ग्रामवासियों ने अपने जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के प्रति भरोसा अर्जित किया है क्योंकि उन्होनें (i) पक्के मकानों का निर्माण शुरू किया है (ii) अपने झोपड़ियों की मरम्म्त करना शुरू किया है, और (iii)जीवन जोखिम और असुरक्षा के कारण विगत में गांव छोड़ने वाले लोगों का पेंथा में पुन: बसना शुरू कर दिया है।
  • गंभीर साइक्लोन हुद हुद (12 अक्तूबर, 2014) के दौरान गैबियन द्वारा रक्षित किए गए पुराने तटबंध का समुद्री किनारे की ढलान बिल्कुल भी प्रभावित नही हुई और जियो ट्यूब के सामने रेत का ढेर लग गया।

तटीय क्षरण नियंत्रण

Beachfront Development
Beachfront Development

दीघा पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध समुद्र तटीय रिजार्ट शहर है जहां प्रतिवर्ष लगभग 26 लाख पर्यटक आते हैं। तथापि, हाल के समय में अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेपों के कारण दीघा अनधिकृत लोगों के भर जाने, सीवेज का टपकना, खुले समुद्री किनारों पर अपशिष्ट पदार्थो का ढेर लगा देने, फेरी लगा कर माल बेचने के अनियंत्रित और अनियोजित क्षेत्रों जैसी अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है और इनका तटीय पारिस्थितिकी पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। आईसीजेडएम परियोजना ने इन मुद्दों का सामना करने के लिए हस्तक्षेप किया है ताकि यह प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पारिस्थितिकी के महत्वपूर्ण मानदंडों को सुदृढ़ बनाकर स्वंय को संभाल सके।

आईसीजेडएमपी के आरंभिक चरण के दौरान दीघा शंकरपुर क्षेत्र के विभिन्न स्टेकधारकों के माध्यम से परामर्श प्रक्रिया में एक एकीकृत समुद्र तटीय क्षेत्र के विकास की योजना तैयार की गई थी। शहरी विकास विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार के तत्वाधान में कार्य कर रहे दीघा-शंकरपुर विकास प्राधिकरण को दीघा में समुद्र तटीय क्षेत्र का विकास करने से संबधित कार्य निष्पादित करने का अधिदेश दिया गया है। प्रायोगिक हस्तक्षपों का लक्ष्य समुद्र तट की सफाई करने, समुद्र तट का सुंदरीकरण करने और दीघा के निवासियों और आने वाले वाले पर्यटकों को मूलभूत सिविक सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ फेरीवालों का पुनर्वास करना था क्योंकि ये समुद्री किनारे पर बिखरे रहते थे और तट की ओर जाने वाले वाले रास्तों को भर देते थे।

दीघा में समुद्र तटीय विकास के चरण-। से संबंधित कार्य को पूरा कर लिया गया है। चरण-। के दौरान सृजित आस्तियों में वाच टावर, समुद्र तटीय सुविधाएं, ओपन एयर थिएटर, फेरीवालों के लिए वेंडर कियोस्क, समुद्र तट पर प्रकाश व्यवस्था, घुमने-फिरने के लिए पक्के फुटपाथ, बैठने की व्यवस्था, कुड़ा डालने के पात्र और संबद्ध सुंदरीकरण कार्य शामिल है।

फेरीवालों का पुनर्वास करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था क्योंकि यह तटीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ था। कारोबार अवसरों, डिजाइन और प्रयुक्त सामग्री को ध्यान में रखकर वेंडर कियोस्क के स्थान को शामिल करते हुए प्रत्येक महत्वपूर्ण विंदु के बारे में फेरीवालों सहित स्टेकधारकों के चरणों में परामर्श किया गया।

परामर्श के चरणों में लिए गए निर्णयों के अनुरूप स्थाई और अस्थाई वेंडर कियोस्कों का निर्माण किया गया। अनधिकृत झोपड़ियां जिन्होने समुद्र तट पर कब्जा कर लिया था, को हटाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया के साथ साथ नए निर्मित कियोस्कों को सौंपने का कार्य बाधारहित और पूर्ण सहमति के साथ पूरा किया गया। पुनर्वास किए गए वेंडरों के मतानुसार नई संरचना से न केवल बेहतर दृश्यावली के साथ साथ सुरक्षा में सुधार हुआ अपितु इससे उनको संभावित ग्राहकों के लिए अपने उत्पादों को और प्रभावी ढंग से प्रदर्शित करने और बेचने में सहुलियत प्राप्त हुई।

गंदगी से भरी हुई जगह के स्थान पर समुद्र तट का सुंदरीकरण जिसमें समुद्री किनारे के साथ साथ पक्के फुटपाथ का निर्माण, सजावटी प्रकाश की व्यवस्था, पूर्णत: प्रकाशमान भू-दृश्यावली क्षेत्रके साथ साथ बैठने की व्यवस्था और बेहतर सफाई सुविधाएं पर्यटकों को किनारों को अपने आगोश में लेने वाली समुद्री लहरों के साथ-साथ सुंदर दृश्यों और ध्वनियों का तालमेल महसूस करने में सहायता प्रदान करती हैं।

ओपन एयर थिएटर ने तटीय समुदायों को विभिन्न लोक संगीत और नृत्य शैलियों को अपने कलात्मक रंग में प्रस्तुत करने के लिए समुदाय स्तरीय सांस्कृतिक इकोसिस्टम हेतु एक अति आवश्यक मंच प्रदान किया है। समुद्र तटीय क्षेत्र के विकास कार्य ने समुद्री किनारे के पर्यावरण में सुधार किया है। इससे क्षेत्र में प्रदूषण और कुड़े-करकट में पर्याप्त रूप से कमी आई है।

सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों का संरक्षण

Conservation of tropical dry
Conservation of tropical dry

वेदारण्यम में तटवर्ती क्षेत्र धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विविधता के अलावा जैव विविधता में भी समृद्ध है और यहां जानवरों और पक्षियों की अनेक विशिष्ट प्रजातियां पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में मैनग्रोव, लगून, ज्वारीय कीचड़ युक्त भूमि, दलदल और उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वन मौजूद हैं। वेदारण्यम के निकट द प्वाइंट कलीमरी वन्यजीव अभ्यारण घास के मैदानों, कीचडदार भूमि, बैकवाटर, बालुकूट और उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों का मिश्रण है।उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वन एक विशिष्ट वन हैं जो केवल तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में पाया जाता है। इनका वितरण उत्तर में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम से दक्षिण में तमिलनाडु के रामनाथपुरम तक पतली तटीय पटृी में सीमित है। इस क्षेत्र की असमान जलवायु परिस्थिति जहां वर्षा गर्मी और शीत दोनों मानसून के दौरान होती है और शुष्क मौसम मार्च से सितंबर तक चलता है, इस पतली पट्टी में उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों के विकास और मौजूदगी के अनुकूल है। टीडीईएफ में पेड़ों, झाड़ियों, लताओं और औषधियुक्त पौधों का एक मिश्रित संयोजन है जो अपरिवर्तित स्थिति में एक क्षेत्र का निर्माण करता है और कीड़ों, उभयचर प्राणियों, सरीसृपों और स्तनपायी जंतुओं सहित जंतुओं की विविध श्रेणियों के लिए आवास स्थल उपलब्ध करवाता है। तथापि, अपरिवर्तित स्थिति में इस प्रकार के वन बमुश्किल बचे हुए हैं और इनमें से अधिकांश विकृत कंटीली झाड़ियों से थोड़ी ही अच्छी स्थिति में है जिनमें बुनियादी वानस्पतिक उत्तमता का अभाव है। टीडीईएफ को वर्तमान समय में द प्वाइंट कलीमरी वन्यजीव अभ्यारण और तटवर्ती अटूट वनों में संरक्षित किया गया है।वेदारण्यम में आईसीजेडएम परियोजना में पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से गांव की 66 एकड़ पंचायती जमीन पर टीडीईएफ को स्थापित करने का एक प्रयास किया गया है।

नमक सत्याग्रह स्मारक स्थल

वेदारण्यम नमक सत्याग्रह स्मारक स्थल के आस-पास लगभग 30 एकड़ भूमि पर टीडीईएफ संस्थापित किया गया है। इस क्षेत्र की निर्धारित भूमि में से कुछ क्षेत्र थोड़ा उपर उठा हुआ है जो द प्वाइंट कलीमरी वन्यजीव अभ्यारण में प्राकृतिक टीडीईएफ की पर्यावरणीय व्यवस्था के समान है किंतु ये क्षेत्र प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा से भरा हुआ है। इन क्षेत्रों में प्रोसोपिस पेड़ों को पलमिरा और अन्य टीडीईएफ पौधों को नुकसान पहुंचाए बिना जड़ से उखाड़ लिया जाता है। नमक सत्याग्रह स्मारक स्थल के आस पास कुछ अन्य क्षेत्रों में भूमि अपेक्षाकृत नीची है और 2004 की सुनामी के दौरान समुद्री जल से भर गया था और इस प्रकार यह भूमि थोड़ी लवणीय हो गई थी। इन क्षेत्रो में मानसून के दौरान वर्षा का पानी एकत्र करने और मानसून के बाद इस पानी को बहा देने के बाद नमक आंशिक रूप से प्राप्त होता है। ऐसा कई मानसून के दौरान किया गया और इसके बाद बाहर से गैर लवणीय मिट्टी ले आने के कारण सुनामी प्रभावित इलाके में छोटे छोटे टीले निर्मित हो गए और इन टीलों पर टीडीईएफ वृक्षो को लगाया गया। चूंकि मिट्टी रेतीली थी और इसमें पोषक तत्वों की कमी थी अत: पौधरोपण से पहले इसे पोषक तत्वों से परिपूर्ण किया गया। 3x3x3 आकार के गड्ढे खोदे गए इनमें 1:1:1 के अनुपात में गोबर, लाल मिट्टी और रेत से भरा गया। इससे नमी को बनाए रखने मे सहायता मिली और और नमक का दबाव कम हुआ। 54 प्रजातियों के 2,116 पौधे (80 सेमी. लंबे) 3 मीटर की दूरी पर लगाए गए। पानी देने के लिए पौधों के चारो ओर कम गहरी नालियां बनाई गईं। गर्मी मे प्रत्येक पौधे के आस पास गीली घास लगाई गई। पौधों को पानी देने के लिए वर्षा जल का संचयन करने के लिए पास ही में दो वर्षा जल संभरण तालाब खोदे गए। गर्मी के दौरान नियमित रूप से पानी दिया गया, कटाई-छंटाई की गई तथा नियमित देखभाल की गई। स्थानीय प्रजातियों तथा इसके जंगल विज्ञान की प्रथाओं की पहचान करने में स्थानीय समुदायों के ज्ञान ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। पौधरोपण का प्रबंधन एक संयुक्त समिति द्वारा किया जा रहा है जिसमें सहभागी गांवों नामत: पूवोन्थोपू, काडीनालवायल, कोवीलानकोलाई, कोविलथावु और आदिवासी कालोनी के ग्राम विकास परिषद के सदस्य शामिल हैं।

Salt Sathyagraha

काडीनालवायल

8 एकड़ भूमि का कुल क्षेत्र स्थानीय देवी देवताओं (वेमपादाई अइयानार पिडारी अम्मा) के मंदिरों और कब्रिस्तान से संबंधित है और गांव के तालाब (वेटुकुलम) के आस पास स्थित भूमि को काडीनालवायल पंचायती राज संस्था द्वारा टीडीईएफ वृक्षारोपण के लिए प्रदान किया गया। इन भूखंडों को सावधानी पूर्वक तैयार करके इनके चारो ओर बाड़ लगाई गई तथा इमारती लकड़ी, फलदार और टीडीईएफ प्रजातियों के लगभग 1,066 पौधे लगाए गए। इस वृक्षारोपण की देखभाल अब काडीनालवायल ग्राम पंचायत द्वारा की जा रही है।

टीडीईएफ वृक्षों से तटवर्ती कुंजों का पुनर्नवीकरण

वेदारण्यम के आस पास स्थित तटवर्ती अटूट झुरमुट टीडीईएफ जीव जंतुओ और वनस्पतियों के भंडारगृह तथा तटवर्ती क्षेत्र के स्थानीय प्रजातियों के लिए घर के रूप में कार्य करते हैं। इन अटूट तटवर्ती झुरमुटों में 65 से अधिक जंगली प्रजातियों की पहचान की गई है तथा इनमें से लगभग 60 प्रतिशत सदाबहार हैं। इसके अलावा अटूट झुरमुटों में औषधिय पौधों की मात्रा बहुतायत मे पाई जाती है। कुडालोर तटीय क्षेत्र में झुरमुटों का अध्ययन 80 से अधिक औषधिय पौधों के होने का संकेत देता है। तथापि इन अटूट झुरमुटों में से अधिकांश कृषि के विस्तार, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, प्रबंधन के पारंपरिक तरीकों के समाप्त होने आदि के कारण नष्ट होने के विभिन्न स्तरों पर हैं। इस परियोजना में टीडीईएफ वृक्षारोपण के लिए ऐसे तीन अटूट झुरमुटों का चयन किया गया है।

पेरियाकुठागई आयनर सेक्रेड ग्रोव

वेदारण्यम के निकट पेरियाकुठागई गांव में लगभग 8 किमी. क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों के साथ सेक्रेड ग्रोव विद्यमान है। इस सेक्रेड ग्रोव में निम्न प्रजातियों के पूर्ण विकसित वृक्ष मौजूद हैं:

  • अटलांटिया मोनोफाइला,
  • गार्सिनिया स्पिकाटा
  • स्ट्रेब्लस एस्पर
  • मेनिलकारा हैक्जेंड्रा
  • मेमेसाइलोनम बेलेटम

परियोजना कार्यकलापों के भाग के रूप में इस सेक्रेड को मंदिर समिति की भागीदारी से संरक्षित किया जा रहा है। पूरे सेक्रेड को अनधिकृत कब्जे से बचाने के लिए बाड़ से घेरा गया है और वनरोपण में उत्पन्न अंतर को भरने के उपाय के रूप में निम्न पौधों को लगाया जा रहा है: अटलांटिया मोनोफाइला के 20 पौधे, गार्सिनिया स्पिकाटा के 25 पौधे, स्ट्रेब्लस एस्पर के 6 पौधे, कोलोफाइलम इनोफाइलम के 35 पौधे और मेसाइलोनम बेलेटम के 65 पौधे लगाए जा रहे हैं। इस पौधरोपण का उत्तर जीवन 76 प्रतिशत है।

आयाकर्नापुलम कालीतीर्थ आयनार सेक्रेड ग्रोव

इस सेक्रेड ग्रोव का आकार लगभग 10 किमी. है और यह आयाकर्नापुलम गांव में स्थित है। लेपिसेंथिस टेट्राफाइला, मधुका लेगिफोलिया, साइजिजियमजंबोलेनम और स्ट्रेब्लस एस्पर के वृक्ष इस सक्रेड ग्रोव में बहुतायत में पाये जाते हैं। देवी कालीतीर्थ तमिलनाडु के साथ साथ दक्षिण एशियाई देशों में रहने वाले तमिल लोगों में बहुत प्रचलित हैं। इसलिए इस मंदिर मे श्रद्धालुओं की संख्या बहुत अधिक होती है और इसी कारण से विभिन्न विकास कार्यो के कारण से सेक्रेड ग्रोव धीरे धीरे कब्जाए जा रहे हैं। सेक्रेड ग्रोव को और विकृत होने से बचाने के लिए परियोजना में पारंपरिक मंदिर समिति के साथ कार्य किया जा रहा है और पूरे क्षेत्र को बाड़ से घेर दिया गया है तथा पौधों में पानी देने के लिए कम गहरे बोर वेल तथा ओवरहेड पानी की टंकी की व्यवस्था की गई है।

थेनादार आयनर सेक्रेड ग्रोव

यह थेनादार नामक गांव में स्थित है और सेक्रेड का क्षेत्र 5 एकड़ में फैला हुआ है। यह पूरी तरह से नष्ट हो चुका है और जब टीडीईएफ वृक्षारोपण के साथ इसके पुनर्नवीकरण कार्यकलाप शुरू किए गए तो यह क्षेत्र पूरी तरह से खाली था। इस सेक्रेड ग्रोव में निम्नलिखित 13 टीडीईएफ प्रजातियों के लगभग 240 पौधे लगाए गए हैं:

  • अटलांटिया मोनोफाइला- 25
  • गार्सिनिया स्पिकाटा – 30
  • मेनिलकारा हैक्जेंड्रा – 35
  • पेलिरोस्टिया अपोजिट – 20
  • सरगाडा अंगुस्टिफोलिया – 25
  • डाइरस इबेनंप्स – 20
  • ड्राईपेट्स स्पाइरा – 15
  • सेपिंडस मार्गीनेटस – 20
  • मिमोसूप इलेंगी- 15
  • कैथियम साइप्राक्स – 5
  • ग्लाइकोमिस मारीसस – 20
  • मुरिया पेनिकुलाटा – 5 और
  • लैपिसाथस टेट्राफाइला – 5 (240)

जैसा कि अन्य सेक्रेड ग्रोव के मामले मे है, वृक्षारोपण से पहले पूरे क्षेत्र को बाड़ से घेरा गया और इसका रखरखाव मंदिर समिति द्वारा किया जा रहा है।

संधानदेवकाडु स्कूल

संधानदेवकाडु गांव में एक प्राथमिक विद्यालय के आस पास लगभग 2 एकड़ भूमि में टीडीईएफ वृक्षारोपण कार्य किया गया। अनेक फलदार वृक्षों और इमारती लकड़ी के वृक्षों के साथ साथ टीडीईएफ की कुल 8 प्रजातियों के पौधे लगाए गए। इस वृक्षारोपण का प्रबंधन संधानदेवकाडु स्कूल इको विकास समिति द्वारा किया जा रहा है जिसमें पंचायती राज संस्थाओं और जिला स्कूल प्राधिकरण तथा एमएसएसआरएफ के प्रतिनिधि शामिल हैं।

निष्पादन मूल्यांकन – सामाजिक आडिट

उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों के पुनर्नवीकरण वृक्षारोपण के निष्पादन का मूल्यांकन एक सामाजिक आडिट दल द्वारा किया गया था जिसमें तमिलनाडु वन विभाग (रेंज अधिकारी) तथा बागवानी विभाग के प्रतिनिधि, एक स्कूल शिक्षक, समुदाय के सदस्य और एमएसएसआरएफ का कर्मचारी शामिल था। इस दल ने सभी स्थलों का दौरा किया और स्टेकधारकों के साथ वृक्षारोपण का प्रबंध करने वाली समितियों से बातचीत की। इस दल ने उत्तर जीवन प्रतिशत, चयनित प्रजातियों, रखरखाव और सुरक्षा के मानकों के आधार पर निष्पादन को बढ़िया के रूप में रेटिंग प्रदान की। पौधों का उत्तर जीवन प्रतिशत 82 से 95 के बीच था।

मॉडल का अनुकरण

  • पन्नल नामक गांव के पंचायती राज संस्था ने एमएसएसआरएफ के तकनीकी निर्देशन में पंचायत की 8 एकड़ भूमि पर टीडीईएफ वृक्षारोपण का अनुकरण करके वृक्षारोपण किया। यह क्षेत्र लवणीय भूमि के निकट स्थित था और इसलिए यह लवणीय था। यह पूरी तरह से जंगली प्रासोपिस जुलिफोरा से भरा हुआ था। भूमि की तैयारी के भाग के रूप में सभी प्रासोपिस जुलिफोरा को जड़ से उखाड़ा गया तथा भूमि को जोता गया जिससे कि सभी नमक के हिस्से मिट्टी में गहराई में दब गए। वर्षा जल के संभरण के लिए बीच मे एक तालाब (0.5 एकड़) का खोदा गया। पूरे क्षेत्र को पूरी तरह से बाड़ से घेर दिया गया।
  • मिमुसोप इलेंगी, मिलिंगटोनिया हार्टेसिया, हिविसकस टिलिसस, कैसिया फिस्टुला, साइजिजियम जंबोलेनम, टर्मिनालिया केटप्पा, थेसपिसिया पोपुलेना, एजडिराचा इंडिका और पांगेमिया पिनाटा के पौधे लगाए गए। प्रासोपिस को निकालने, भूमि की तैयारी करने, बाड़ लगाने, वृक्षारोपण करने, तालाब की खुदाई करने, नियमित सिंचाई करने तथा निगरानी करने के लिए नरेगा योजना का उपयोग किया गया। प्रासोपिस को बेचने से प्राप्त धन का भी उपयोग किया गया। पौधों की आपूर्ति तमिलनाडु वन विभाग द्वारा की गई।
  • मुथुपेट में रहमत मैट्रिकुलेशन बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय ने एमएसएसआरएफ के तकनीकी निर्देशन में इस माडल की नकल 12 एकड़ भूमि में की है।

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