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होमपरियोजनाआईसीजेडएम प्रोजेक्ट चरण 1आईसीजेडएम की उत्पत्ति

पर्यावरणीय संवेदनशीलता के संबंध में भारतीय तटों का आर्थिक महत्व और भारतीय तटरेखाओं की आर्थिक क्षमता

समुद्री तटों के किनारे मैनग्रूव, समुद्री घास, मूंगा चट्टाने, ज्वार फलक, नदी के मुहाने, लगून, बालू के टीले और रेह जैसे तटीय पारिस्थितिकी के लिए संवेदी क्षेत्रों की एक व्यापक श्रेणी मौजूद होती है और देश की लगभग एक चौथाई जनसंख्या समुद्र तटों के 50 किमी. के भीतर निवास करती है। पूर्वी समुद्र तट पर बंगाल की खाड़ी में तथा पश्चिमी तट पर अरब सागर में अनेक नदियां गिरती हैं और अपने साथ बड़ी मात्रा में अवसाद ले आती हैं। पूर्वी समुद्र तट पर बड़ी नदियों के डेल्टा और रेतीले समुद्र तटों का प्रभुत्व है जबकि पश्चिमी तट पर दहाने, बैकवाटरऔर प्रमुख रूप से चट्टानी तटरेखाओं का जटिल नेटवर्क विद्यमान है। तटीय आवास अकेले सभी समुद्री जैव उत्पादकता और खाड़ी पारिस्थितिकी उत्पादन के लगभग एक तिहाई हिस्से का योगदान करते हैं। तटीय पारि-प्रणाली की सेवाएं और सामान प्रावधान संबधी सेवाओं का सृजन करते हैं जिसमें खाद्य पदार्थ, नमक, खनिज पदार्थ और तेल संसाधन, विनिर्माण सामग्री और जैव विविधता सहित आनुवांशिक स्टाक शामिल हैं जिनका उपयोग विभिन्न जैव-प्रौद्योगिकी और औषधिय अनुप्रयोगों में किए जाने की संभावना है।

भारत के 7500 किमी. तटीय क्षेत्र (द्वीपीय क्षेत्रों सहित) के किनारे 13 प्रमुख पत्तन और 176 कम प्रमुख पत्तन हैं। भारत मछली का छठा सबसे बड़ा उत्पादक देश है जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 3.92 मिलियन टन है। समुद्र तटीय मत्स्य कारोबार में पूर्णकालिक रूप से लाखों लोग कार्य करते हैं और मत्स्य उत्पादन के पश्चात क्षेत्र में 1.2 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 200000 पारंपरिक नौकाओं से पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने का कार्य होता है तथा लगभग मछली पकड़ने की 35,000 यंत्रीकृत नौकाओं से उनकी मछली पकड़ने की वार्षिक क्षमता में वृद्धि हो रही है।

क्षेत्र की चुनौतियां और इसकी अतिसंवेदनशीलता

पारिस्थितिक रूप से समृद्ध होने तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को इसके योगदान के बावजूद समुद्र तटीय और मरीन क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा नही दी गई है और ये क्षेत्र दबाव में हैं। प्रमुख मामले संसाधनों और तटीय पारि-प्रणाली के दुरूपयोग, अधिक उपयोग तथा इनको हानि पहुंचाने, स्टेकधारकों के बीच संघर्ष, तटवर्ती जोखिमों से होने वाली हानियों, आजीविका सुरक्षा को खतरे, बढ़ता दबाव, आर्थिक अवसंरचना के लिए मांग और स्थाई विकास के लिए हद से ज्यादा चिंताओं से संबंधित हैं। प्रमुख चुनौतियां जिनमें खतरे का अंदेशा है, निम्नवत हैं :

  • तटवर्ती क्षेत्रों और तटवर्ती समुदायों की अतिसंवेदनशीलता।
  • शहरी और ग्रामीण विकास तथा आर्थिक आवश्यकताओं का विस्तार करने का बढ़ता हुआ दबाव।
  • तटीय और मरीन संसाधनों और निवास स्थानों का अपकर्ष।
  • सेक्टोरल और अनियंत्रित विकास के कारण संदूषण और प्रदूषण का संचयन।
  • मरीन और तटीय क्षेत्रों में क्षेत्रगत आयोजना और प्रबंधन का समन्वय नहीं है और प्राय: विवाद युक्त होता है।
  • आर्थिक अवसंरचना की एकीकृत योजना का अभाव।
  • विधिक और नीतिगत ढांचे का पर्याप्त ढंग से क्रियान्वयन नही किया गया है।
  • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में संगत स्टेकधारकों की भागीदारी का अभाव है।
  • तटीय अंचलों का प्रबंधन करने में पर्याप्त क्षमता, कौशल, ज्ञान का अभाव है।
  • जलवायु परिवर्तन ने तटीय समुदायों और अवसंरचना के लिए जोखिम में वृद्धि की है।

उपर्युक्त के फलस्वरूप तटवर्ती अंचलों में आर्थिक अवसंरचना के विकास के लिए सेक्टोरल, अनुशासनात्मक और संस्थागत सीमाओं के बीच एकीकृत दृष्टिकोणअपनाने, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक परिदृश्य तथा पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करने, सामाजिक समानता और सुरक्षा को बढ़ावा देने, संवेदनशील तटीय जनसंख्या को गरीबी से उपर उठाने और तटों के प्रबंधन को भारत के संतुलित और स्थाई वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण घटक के रूप में माना जा रहा है।

एकीकृत तटीय अंचल प्रबंधन परियोजना, चरण-।

भारतीय तटरेखा लगभग 7500 किमी. लंबी है जिसमें लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की मुख्यभूमि और द्वीप शामिल हैं और यह विशिष्ट मरीन और तटीय पारि-प्रणाली का घर है। लगभग 25% भारतीय जनसंख्या तटो/द्वीप समूहों के आस-पास निवास करती है और यह तटीय संसाधनों और अवसरों पर निर्भर है। सुनामी सहित समुद्र से उत्पन्न होने वाले प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से इस जनसंख्या को बहुत अधिक जोखिम है। इसलिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने समग्र तटीय प्रबंधन के माध्यम से तटीय और मरीन पारि-प्रणाली और इसके वातावरण को सुरक्षित और संरक्षित करने तथा राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006, ‘फाइनल फ्रंटियर 2009’, लोक लेखा समिति (2009-2010) की सिफारिशों का कार्यान्वयन करने तथा सीआरजेड अधिसूचना, 2011 तथा आईपीजेड अधिसूचना, 2011 और जनता की भागीदारी के साथ नियामकीय संरचना का कार्यान्वयन करने के लिए भारत में एकीकृत तटीय अंचल प्रबंधन (आईसीजेडएम) परियोजना का आंरभ किया है। परियोजना का प्रावधान निम्न लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया गया है:

  • तटवर्ती क्षेत्रों और मरीन क्षेत्र का स्थाई विकास करने का लक्ष्य प्राप्त करना।
  • प्राकृतिक आपदाओं विशेष रूप से समुद्र के स्तर का बढ़ना और साइक्लोन और तुफान आने की घटनाओं में वृद्धि के संदर्भ में जोखिम को कम करना जिनका प्रभाव तटवर्ती क्षेत्रों और तटवर्ती समुदायों पर अधिक होता है।
  • मैनग्रूव, खारे पानी की नम भूमियों और मूंगे की चट्टानों जैसे नाजुक तटवर्ती पारि-प्रणाली को संरक्षित व सुरक्षित करने के साथ-साथ तटवर्ती जल का प्रदूषण कम करना और स्थानीय समुदायों की आजीविका में सुधार करना।
  • राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 के अनुसार एकीकृत और स्थाई तटीय प्रबंधन के लिए संस्थागत और अभिशासन क्षमता को मजबूत बनाना।
  • श्रेष्ठ प्रथाओं के पाठों को स्थानीय और वैश्विक दोनो भाषाओं में दर्ज करना तथा इसका प्रसार करना।

यह परियोजना गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल राज्यों के चिन्हित इलाकों में विश्व बैंक की सहायता से एक प्रायोगिक पैमाने पर शुरू की गई है।
एकीकृत तटीय प्रबंधन सोसाइटी एकीकृत तटीय प्रबंधन परियोजना चरण-। के लिए नोडल एजेंसी है जिसका कार्यान्वयन जुलाई 2010 से 1580.10 करोड़ रूपए (262 मिलियन अमरीकी डालर) के बजट परिव्यय से विश्व बैंक की सहायता से किया जा रहा है और इसे पूरा करने की समय-सीमा 31 दिसंबर, 2018 है। राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व, निदेशन, अनुमोदन, निधि और सुविधाएं प्रदान करने के लिए सेकाम के पास तटीय अंचल प्रबंधन के बारे में दिशानिर्देश देने तथा समन्वय करने के लिए एक उपयुक्त राष्ट्रीय अवसंरचना की स्थापना करने तथा इसे सहायता देने का अधिकार है। इसके उप-संघटकों में निम्न बातें शामिल हैं:

  • जोखिम रेखा और तटीय अवसाद सेल की मैपिंग
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र
  • स्थाई तटीय प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय केंद्र की स्थापना; और
  • राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता बर्धन

तीन प्रायोगिक राज्यों गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल में आईसीजेडएम के संबंध में राज्य स्तरीय दृष्टिकोण का विकास करने और इसका कार्यान्वयन करने का उद्देश्य राष्ट्रीय कार्यनीतियों के अनुरूप उपयुक्त आईसीजेडएम दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए राज्य स्तरीय प्राधिकरणों को तैयार करना एवं सशक्त बनाना है। इसके उप-संघटकों में निम्न बातें शामिल हैं:

  • चुनिंदा तटीय क्षेत्रों के लिए आईसीजेडएम योजनाओं को तैयार करना;
  • राज्य स्तरीय तटीय अंचल प्राधिकरणों को संस्थागत रूप से सुदृढ़ बनाना;
  • स्थानीय आईसीजेडएम के अनुरूप पाइलट निवेश को तटीय संसाधनों के तीन विषयों यथा संरक्षण/सुरक्षा; प्रदूषणप्रबंधन; और सामुदायिक आजीविका में वृद्धि और समुद्र स्तर के बढ़ने के जोखिम के प्रति अनुकूलन के संबंध में प्राथमिकता दिया जाना।